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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
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धृतराष्ट्र उवाच
तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन |  १६   क
उचितं हि कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति