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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
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वैशम्पाय़न उवाच
ग्लाय़ते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति |  २०   क
वय़सा च प्रकृष्टेन वाग्व्याय़ामेन चैव हि ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति