आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ६

वैशम्पाय़न उवाच

इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः |  २१   क
गान्धारीं शिश्रिय़े धीमान्सहसैव गतासुवत् ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति