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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
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युधिष्ठिर उवाच
पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च |  ५   क
अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति