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वन पर्व
अध्याय ६
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वैशम्पाय़न उवाच
समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभा; स्ततोऽपृच्छन्नागमनाय़ हेतुम् |  ११   क
स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस; यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽऽम्विकेय़ः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति