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वन पर्व
अध्याय ६
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विदुर उवाच
परं श्रेय़ः पाण्डवेय़ा मय़ोक्तं; न मे तच्च श्रुतवानाम्विकेय़ः |  १४   क
यथातुरस्येव हि पथ्यमन्नं; न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति