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वन पर्व
अध्याय ६
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विदुर उवाच
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽव्रवीन्मां; यत्र श्रद्धा भारत तत्र याहि |  १७   क
नाहं भूय़ः कामय़े त्वां सहाय़ं; महीमिमां पालय़ितुं पुरं वा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति