वन पर्व  अध्याय ६

वैशम्पाय़न उवाच

विदुरस्त्वपि पाण्डूनां तदा दर्शनलालसः |  ५   क
जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति