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विराट पर्व
अध्याय ६
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विराट उवाच
ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि; प्रशाधि मत्स्यान्वशगो ह्यहं तव |  ११   क
प्रिय़ा हि धूर्ता मम देविनः सदा; भवांश्च देवोपम राज्यमर्हति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति