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विराट पर्व
अध्याय ६
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विराट उवाच
समानय़ानो भवितासि मे सखा; प्रभूतवस्त्रो वहुपानभोजनः |  १४   क
पश्येस्त्वमन्तश्च वहिश्च सर्वदा; कृतं च ते द्वारमपावृतं मय़ा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति