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विराट पर्व
अध्याय ६
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं स लव्ध्वा तु वरं समागमं; विराटराजेन नरर्षभस्तदा |  १६   क
उवास वीरः परमार्चितः सुखी; न चापि कश्चिच्चरितं वुवोध तत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति