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विराट पर्व
अध्याय ६
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वैशम्पाय़न उवाच
शरीरलिङ्गैरुपसूचितो ह्ययं; मूर्धाभिषिक्तोऽय़मितीव मानसम् |  ६   क
समीपमाय़ाति च मे गतव्यथो; यथा गजस्तामरसीं मदोत्कटः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति