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द्रोण पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
एवं व्रुवन्तस्तेऽन्योन्यं हृष्टरूपा विशां पते |  १४   क
राधेय़ं पूजय़न्तश्च प्रशंसन्तश्च निर्ययुः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति