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कर्ण पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिह संय़ुगे |  २५   क
स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति