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कर्ण पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
न हि पार्थाः सपाञ्चालाः स्थातुं शक्तास्तवाग्रतः |  ४२   क
आत्तशस्त्रस्य समरे महेन्द्रस्येव दानवाः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति