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शल्य पर्व
अध्याय ६
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शल्य उवाच
अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावय़िष्ये समन्ततः |  १७   क
द्रोणभीष्मावति विभो सूतपुत्रं च संय़ुगे |  १७   ख
विचरिष्ये रणे युध्यन्प्रिय़ार्थं तव कौरव ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति