उद्योग पर्व  अध्याय १२७

वैशम्पाय़न उवाच

प्रपद्यस्व महावाहुं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् |  ३७   क
प्रसन्नो हि सुखाय़ स्यादुभय़ोरेव केशवः ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति