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सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि प्रमत्तेन नरेण लभ्या; विद्या तपः श्रीर्विपुलं यशो वा |  २२   क
पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रू; न्सर्वान्महेन्द्रं सुखमेधमानम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति