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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भरद्वाज उवाच
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य च |  २२   क
कान्यत्र परिमाणानि संशय़ं छिन्धि मेऽर्थतः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति