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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
युक्तो रथवरो राजन्वासुदेवस्य धीमतः |  १२   क
समीपमापगेय़स्य प्रय़ास्यति जनार्दनः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति