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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
अद्य धर्मसुतो राजा दृष्ट्वा मम पराक्रमम् |  १२   क
अश्वत्थाममय़ं लोकं मंस्यते सह सोमकैः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति