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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह |  ६८   क
विस्मय़ो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति