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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि द्रोणं च भीष्मं च कर्णं च रथिनां वरम् |  १४   क
स्पर्धते स्म रणे नित्यं दुहितुः पुत्रको मम ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति