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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मरं वत वार्ष्णेय़ कालेऽप्राप्ते नृभिः सदा |  ९   क
यत्र मे हृदय़ं दुःखाच्छतधा न विदीर्यते ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति