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सभा पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्तु क्षत्तारमिति व्रुवाणो; दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः |  १   क
अवैक्षत प्रातिकामीं सभाय़ा; मुवाच चैनं परमार्यमध्ये ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति