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सभा पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वं प्रातिकामिन्द्रौपदीमानय़स्व; न ते भय़ं विद्यते पाण्डवेभ्यः |  २   क
क्षत्ता ह्ययं विवदत्येव भीरु; र्न चास्माकं वृद्धिकामः सदैव ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति