सभा पर्व  अध्याय ६०

दुर्योधन उवाच

एह्येहि पाञ्चालि जितासि कृष्णे; दुर्योधनं पश्य विमुक्तलज्जा |  २०   क
कुरून्भजस्वाय़तपद्मनेत्रे; धर्मेण लव्धासि सभां परैहि ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति