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सभा पर्व
अध्याय ६०
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दुर्योधन उवाच
रजस्वला वा भव याज्ञसेनि; एकाम्वरा वाप्यथ वा विवस्त्रा |  २७   क
द्यूते जिता चासि कृतासि दासी; दासीषु कामश्च यथोपजोषम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति