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सभा पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
तां कृष्यमाणां च रजस्वलां च; स्रस्तोत्तरीय़ामतदर्हमाणाम् |  ४७   क
वृकोदरः प्रेक्ष्य युधिष्ठिरं च; चकार कोपं परमार्तरूपः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति