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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
स्वस्रीय़ं च हतं श्रुत्वा दुःखं स्वपिति केशवः |  ११   क
कृतागसो वय़ं तस्य स मदर्थं कथं क्षमेत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति