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वन पर्व
अध्याय ६०
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वृहदश्व उवाच
यथाहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तय़े |  ३७   क
तथाय़ं पततां क्षुद्रः परासुर्मृगजीवनः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति