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विराट पर्व
अध्याय ६०
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अर्जुन उवाच
युधिष्ठिरस्यास्मि निदेशकारी; पार्थस्तृतीय़ो युधि च स्थिरोऽस्मि |  १७   क
तदर्थमावृत्य मुखं प्रय़च्छ; नरेन्द्रवृत्तं स्मर धार्तराष्ट्र ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति