द्रोण पर्व  अध्याय १६

सञ्जय़ उवाच

अर्जुनेन विहीनस्तु यदि नोत्सृजते रणम् |  ८   क
मामुपाय़ान्तमालोक्य गृहीतमिति विद्धि तम् ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति