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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
ततो हा हेति सहसा शव्दो मुक्तो नराधिपैः |  २७   क
देवैर्महर्षिभिश्चैव साधु साध्विति भारत |  २७   ख
विस्मितैरीरितः शव्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति