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द्रोण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
स रथे रथिनां श्रेष्ठः काञ्चने काञ्चनावृतः |  १७   क
विवभौ विमलोऽर्चिष्मान्मेराविव दिवाकरः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति