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द्रोण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततो जिष्णुर्महदाश्चर्यमुत्तमम् |  ५   क
दृष्टवानस्मि भद्रं ते केशवस्य प्रसादजम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति