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कर्ण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
तस्यास्यतस्तानभिनिघ्नतश्च; ज्यावाणहस्तस्य धनुःस्वनेन |  १८   क
साद्रिद्रुमा स्यात्पृथिवी विशीर्णा; इत्येव मत्वा जनता व्यषीदत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति