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कर्ण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
रथद्विपा वाजिपदातय़ोऽपि वा; भ्रमन्ति नानाविधशस्त्रवेष्टिताः |  २८   क
परस्परेणाभिहताश्च चस्खलु; र्विनेदुरार्ता व्यसवोऽपतन्त च ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति