वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

सा दृष्ट्वैवाश्रमपदं नानामृगनिषेवितम् |  ६१   क
शाखामृगगणैश्चैव तापसैश्च समन्वितम् ||  ६१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति