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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
वभूव तेषां परमः प्रहर्ष; स्तेनाप्रमेय़ेण समागतानाम् |  २२   क
स चापि तान्प्रेक्ष्य किरीटमाली; ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति