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कर्ण पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
तमभ्यधावन्निहते कुमारे; कैकेय़सेनापतिरुग्रधन्वा |  ४   क
शरैर्विभिन्नं भृशमुग्रवेगैः; कर्णात्मजं सोऽभ्यहनत्सुषेणम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति