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वन पर्व
अध्याय १३१
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राजो उवाच
वहुकल्याणसंय़ुक्तं भाषसे विहगोत्तम |  १३   क
सुपर्णः पक्षिराट्किं त्वं धर्मज्ञश्चास्यसंशय़म् |  १३   ख
तथा हि धर्मसंय़ुक्तं वहु चित्रं प्रभाषसे ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति