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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सङ्गरमद्भुतम् |  १२   क
दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वय़ानघ ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति