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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
नैष योग्योऽद्य मित्रं वा शत्रुर्वा पुरुषाधमः |  २१   क
किमनेनातिनुन्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति