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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
पुनश्च पतिते चक्रे व्यसनार्तः पराजितः |  ३६   क
पातितः समरे कर्णश्चक्रव्यग्रोऽग्रणीर्नृणाम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति