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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्येत्य महाराज योगमास्थाय़ भिक्षुकः |  ५   क
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति