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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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वासुदेव उवाच
अनक्षज्ञं च धर्मज्ञं सौवलेनाक्षवेदिना |  ४४   क
निकृत्या यत्पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति