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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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वासुदेव उवाच
अभिमन्युश्च यद्वाल एको वहुभिराहवे |  ४६   क
त्वद्दोषैर्निहतः पाप तस्मादसि हतो रणे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति