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शल्य पर्व
अध्याय ६०
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सञ्जय़ उवाच
ववौ च सुरभिर्वाय़ुः पुण्यगन्धो मृदुः सुखः |  ५३   क
व्यराजतामलं चैव नभो वैडूर्यसंनिभम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति