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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
निर्मर्यादे नित्यमर्थे विनष्टा; नाहुस्तान्वै पशुभूतान्मनुष्यान् |  ७   क
यथा नीतिं गमय़त्यर्थलोभा; च्छ्रेय़ांस्तस्मादाश्रमः क्षत्रधर्मः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति